अद्भुत प्रतिभा की धनी : पू. माँ श्री कौशल

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अजात वैरागी, पूर्वजन्म आत्मसाधना से संस्कारित एक साधक आत्मा का अवतरण अपने ननिहाल (स्वास्तिका मैटल वर्क्स) जगाधरी मे माता श्रीमती शकुन्तलावती की पावन कुक्षी से हुआ। पानीपत (हरियाणा) मे उनके पिता श्री भगवानदासजी स्वभाव से सरल, निस्पृह व गृहस्थयोगी थे। सभी की लाडली एक कली को पाकर उनका आंगन खिल उठा। जिसका का नाम रखा गया ‘कौशल’। तत्पश्चात नाजो से पली बालिका ने अहर्निश ज्ञानाराधना व उच्चशिक्षा, संस्कृत व कन्योचित सिलाई कढाई की विद्या प्राप्त की।
पानीपत निवासी ब्रह्मचारी जिनेन्द्र जी (बाद मे क्षु० जिनेन्द्रवर्णी जी) बालिका कौशल की सूक्ष्म प्रज्ञा से प्रभावित होकर के महान कृति ”जैनेन्द्र सिध्दांत कोश की रचना करके का भाव उनके मन जागृत हुआ अौर लपक उठे, उतावले हो गए बाला कौशल को सहभागी सहयोगी बनाने के लिए उन्होने उस बाला यह पावन कार्य करने का सकंल्प कराया।
उस बाला ने पूर्ण अखण्ड ब्रह्मचार्य पूर्वक सप्तम प्रतिमा धारण करने की भीष्म प्रतिज्ञा ग्रहण की कई वर्षो तक कठिन तप, श्रम, घोर संघर्ष करती हुई वह बढती रही पानीपत, सहारनपुर, ईशरी मे व नसीराबाद मे उनकी लेखन क्रिया जारी रही। एक दिन वह आया जब वह संकल्प पूर्ण हुआ। अपनी साधना का फल देख कर वह बहुत आनन्दित हुई । श्रुत पंचमी सन् 1965 के दिन उस पवित्र श्रुत कृति (”जैनेन्द्र सिध्दांत कोश”) की पूजा का महोत्सव किया गया। उस पावन अवसर पर भगवान शांतिनाथ जी एवं सर्वजन समूह के समक्ष क्षुल्लक जिनेन्द्र वर्णी जी ने गद्-गद् व भाव विभोर होकर कहा कि इस बाल योगिनी ने इस वृहत् कार्य की तत्परता के रूप मे कठिन तपस्या की इसके बिना यह कार्य नही हो सकता था। अतः इसमे लेखक के रूप मे मै अपना नाम न देकर इसी का नाम दूंगा। इसी की सम्पदा मै इसी को अर्पण करता हूं।
वह साधिका ने स्वाधीन व स्वतंत्र का मार्ग अपना कर उस सत्य पथ पर आगे बढती गई जो शांत व निख था। वह जिधर भी जाती जन सैलाब उमड पडता उसकी एक छवि पाने को।
दो-दो माह के मौन व एकान्तवास से अर्जित अध्यात्मिक सम्पदा को जन-जन मे वितरित करती। तब सर्वजन अन्तिम तीर्थंकर भगवान महावीर से जैनधर्म का उद्भव मानते थे। किन्तु इस सत्य साधिका ने प्रागेतिहासिक आदि पुरूष प्रथम तीर्थंकर विश्वपितामह भगवान ऋषभदेव का जयघोष किया। ”जैन धर्म की प्राचीनता बताने के लिए ऋषभदेव का स्मरण आवश्यक है”। सर्व धर्मो मे उस महामानव को किसी न किसी रूप मे माना है, पूजा है। उस आदि पुरूष का जीवन अपने आप मे सम्पूर्ण है। उन्होने परिवारिक, सामाजिक, राजनैतिक एवं अध्यात्मिक योग विद्या का उपदेश दिया है।
दूसरा सूत्र इस साधिका ने दिया कि ”जैन धर्म त्याग प्रधान नही अपितु ध्यान प्रधान है”। सभी जैन मूर्तियां ध्यानयोग की मुद्रा वाली है। बाह्य तप ध्यान की सिध्दि के लिए है ध्यान के बिना सब तप कायक्लेश मात्र है।
माँ के द्वारा 100 से अधिक पुस्तको का सृजन हुआ है। व्यवहार मे सबसे प्रेमभाव व साधुअो के प्रति विनम्र रहना उनका स्वभाव है। जगत जननी माँ ने 40 वर्षो तक बद्रीनाथ से कन्याकुमारी तक भ्रमण कर वीतराग पथ का प्रचार किया।
वीतराग पथ गामिनी ने श्रमण संस्कृति के प्राण योग विद्या के प्रयोग का स्वयं प्रयोग किये। अनेक स्थलो ध्यान योग शिविर लगाये गये। जिसमे बहु संख्या मे जिज्ञासुअो ने भाग लिये। इस साधना से साधको को शारीरिक व मानसिक रोगो से तात्कालिक लाभ हुआ। फलस्वरुप इस विद्या के निरन्तर प्रयोग के लिए स्थायी केंद्र बनाने की मांग हुई। अनेक दृष्टियो से विचार कर माँ ने दिल्ली-मेरठ मार्ग का स्थल चयन किया। माँ के परिवार से सन् 1988 मे संस्था के नाम से जमीन खरीदी गई। आश्चर्य है यहाँ भगवान ऋषभदेव का प्रतिबिम्ब स्थापित होते ही यह अशान्त क्षेत्र शान्त क्षेत्र बन गया। प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के नाम पर उनकी विहार स्थली होने से इसका नाम ऋषभांचल रखा गया। इस प्रकार ऋषभांचल ध्यान योग केन्द्र के पावन क्षेत्र का उद्भव जीवन्त तीर्थ के रूप मे हुआ है। ऋषभांचल की धरा विहारगत साधुअो की चरण रज से पवित्र होती रहती है। माँ की सतत साधना से यह केंद्र जीवन्त बना हुआ है तथा निरन्तर जनता को अहिंसा व शान्ति का सन्देश देता रहता है

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