आगमधारा” उपदेश – पूज्य क्षुल्लक श्री ध्यानसागर जी महाराज

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“आगमधारा” उपदेश:

????ज्ञान में सबसे बड़ी बाधा,सत्य को पहचानने में सबसे बड़ा रोड़ा अपने आप को ज्ञानी समझ लेना है।
????जब हम सिद्धांत और अध्यात्म इन दोनों दृष्टियों से जीव की पहचान करते हैं तब वह पहचान पूर्ण होती है।
????तत्त्वचिंतन करने से मन को विश्राम मिलता है, भीतर सूकून मिलता है।
सोचने का ढंग बदलने से आकुलता शांत होती है।
???? “नज़रिया बदलने से नज़ारा बदल जाता है”
बस यही कार्य जीव को इसी जन्म में अंतिम श्वास तक कर लेना है।
????अतिविश्वास से बचना है।
????प्रमाद जीव का बहुत बड़ा शत्रु है।
????आलस पतन का कारण है
????हमेशा सतर्क रहना है।
???? समाधितंत्र में आचार्य पूज्यपाज स्वामी ने लिखा है;
????चिरं सुषुप्तास्तमसि मूढात्मानः कुयोनिषु।
अनात्मीयात्मभूतेषु ममाहमिति जाग्रति॥
〰 अनादि काल से यह जीव मिथ्यात्व के अंधेरे में अनंतानुबंधी की चद्दर तानकर गहरी नींद में सोये हुए है, अब तो जागने का समय है सोने का सवाल ही नहीं उठता ।

???? ध्यानामृत ????

???? जैसे सावधानीपूर्वक सुई में धागा डालने वाला मनुष्य या तो अपना चश्मा सही कर लेता है या धागे को कुछ नुकीला बना लेता है, वैसे ही जीवन को सही बनाने के लिये कुछ बदलाव ज़रूरी है; या तो हम अपना नज़रिया बदल लें या वातावरण में आवश्यक फेर-बदल कर लें।
अपने को बदले बिना सारी दुनिया को बदलने का सपना सच कैसे हो सकता है ?
बदलाव से इंसान भला या बुरा बन सकता है, वरना वह ज्यों का त्यों रहता है।
हम जैसे हैं वैसा ही बने रहेंगे तो वैसा ही होता रहेगा जैसा होता आया है।
अरहंत बदले तभी सिद्ध बने!
जैनं जयतु शासनम्।

उपदेशक: जिनवाणी पुत्र क्षुल्लक श्री ध्यानसागर जी महाराज

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