आचार्य ज्ञान सागर जी का 43 वां समाधि दिवस मनाया

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अशोकनगर :  इस युग के महान दर्शानिक संत वीरोदय, जयोदय, दयोदय जैसे महाकाव्य लिखने वाले आचार्य ज्ञान सागर जी महाराज का ४३ वां समाधि दिवस आर्यिका रत्न पूर्णमति माताजी ससंघ के सानिध्य में अशोकनगर जैन समाज द्वारा मनाया गया इस अवसर पर आचार्य श्री के व्यक्तित्व, कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।0

इससे पूर्व समारोह के प्रारम्भ में आचार्य श्री के चित्र के समक्ष द्वीप प्रज्जवलन किया इस अवसर पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए आर्यिका रत्न पूर्णमति माताजी ने कहा कि मरूभूमि के लाल आचार्य ज्ञानसागर जी ने गहन साहित्य साधना कर तत्व दृष्टि को विकसित किया एक पण्डित, विद्धान का संत पद पर चल देना बड़े आश्चर्य की घटना है उसमें भी निष्प्रयी भाव से धर्म आराधना का मार्ग और भी दुर्लभ है आचार्य श्री ने आचार्य विद्यासागर जी महाराज जैसे महान संत को हम सब के बीच दिया है जिनकी जीवंतचर्या से समूचे भारत वर्ष में दिगम्बरत की पहचान हुई है आचार्य श्री ज्ञान सागर जी ने अपना पद छोड़कर विद्यासागर जी को पद पर बिठाया और उनके चरणों में समाधि पूर्वक संल्लेखना धारण की यह अभूत पूर्व घटना है जब गुरू शिष्य को अपना आसन देकर शिष्य को गुरू बनाता है उनके जैसी महान निर्दोष समाधि देखने में नहीं आई ।सुखी होना अलग बात है और भ्रम में रहना अलग है ।माताजी ने धर्मसभा में कहा कि सब के सुख की कामना करें तो सब सुखी हो या न हो पाये लेकिन सुख की कामना करने वाले को सुख अवश्य मिलेगा इसलिए हमें सच्चे ह्‌दय से जगत के सुख की कामना करना चाहिए उन्होंने कहा कि सुखी होना अलग बात है और भ्रम से सुखी मानना अलग बात है यदि हम सुखी है तो साधन क्यों जुटा रहे है हर पल हमारा नये-नये साधनों की प्राप्ति और चाह के लिए व्यतीत हो रहा है जब तक हम सुखी होने का प्रयास करते रहेगे तब तक आप सच्चे सुख को प्राप्त नहीं हो सकते भ्रम से अपने आप को सुखी मानना नर्क का कारण है क्योंकि आप सच्चे सुख को समझ ही नहीं पाएगे और न ही सच्चे धर्म को अपने आप को सुखी बनाना है तो भ्रम को त्यागकर यथार्थ में जिये और अपने जीवन को अच्छा बनाए

 

रिपोर्ट : अभिषेक जैन रामगंजमंड़ी

 

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