जैन कर्म-सिद्धान्त और वंश परम्परा विज्ञान

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सारांश वंश परम्परा विज्ञान (उाहाूग्म् एम्गहम) की शाखा ण्त्दहग्हु द्वारा विभिन्न जीवधारियों की हूबहू प्रतिलिपि तैयार करने में वैज्ञानिकोें को मिली सफलता ने जैन कर्म सिद्धान्त के सम्मुख कुछ प्रश्नन उपस्थित किये हैं। प्रस्तुत आलेख में दोनों का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करने के उपरान्त ज्वलंत प्रश्नों का तार्विक समाधान प्रस्तुत किया गया है।

लोक या ब्रह्माण्ड मुख्यतया दो तत्वों-चेतन और जड़ से बना है। इन दोनों का अस्तित्व शाश्वत है। दोनों के पर्याय बदलते रहते हैं, इसी कारण सृष्टि में हर क्षण रूपांतरण होता रहता है। जैन कर्म- सिद्धान्त के अनुसार चेतना व जड़ का तादात्म्य अनादि अनंत काल से है तथा वह तब तक बना रहेगा जब तक आत्मा पौदगलिक कर्म-बंधनों का पूर्ण क्षय कर मुक्त अवस्था को प्राप्त नहीं कर लेती।

जैन कर्म-सिद्धान्त के अनुसार ‘उपयोग लक्षणो जीव:’। जीव (आत्मा -चेतना) का लक्षण उपयोग है। ज्ञान-दर्शन को उपयोग कहते हैं। ज्ञान-दर्शन को आबद्ध करने वाला मुख्य मोहनीय कर्म है। मोह के कारण राग-द्वेष। राग-द्वेष के कारण कर्म। कर्म के कारण जन्म-मरण। जन्म-मरण के कारण दु:ख की उत्पत्ति। इस प्र्रकार यह आवृत्ति पुनरावृत्ति होती रहती है। तत्वार्थसूत्र में कहा गया ‘‘बध्यते परतन्त्रीक्रियते आत्माऽनेनेति बन्धनम्’’। जिसके द्वारा आत्मा परतन्त्र कर दिया जाता है वह बंधन (कर्म) है। जैन कर्म-सिद्धान्त के अनुसार कर्मबद्ध आत्मा ही नये कर्मों का संचय करती है, मुक्त आत्मा कर्म संचय नहीं कर सकती क्योंकि उनके कर्म बीज या राग-द्वेष पूर्णत: नष्ट हो चुके होते हैं। जैन कर्म-सिद्धन्ता के अनुसार आत्मा कर्म का उपादान है। आतमा कर्म की कर्ता तथा भोक्ता है। उपादान तभी व्यक्त होता है जब उसे निमित्त मिले। कर्मों को भोगने के लिए निमितत बनते हैं-योग (मन-वचन-काया), वातावरण तथा परिस्थिति। बिना निमित्त के कर्म आत्मा प्रदेशों में ही भोग लिए जाते है। कषाय (राग-द्वेष) योगों की चंचलता बढ़ाते हैं। योग चंचल होने पर कषाय को उत्तेजित करे हैं तथा कर्म योग्य पुदगलों बंध होता हैं। इस प्रकरी पूरा एक चक्र है।१

शरीर माध्यम बनता है चेतना की अभिव्यक्ति का एवं कृत कर्मों के भोगने का। स्थूल शरीर का घटक है। ‘‘जीन’’। सूक्ष्म शरीर का घटक है कर्म। जैसा ‘‘जीन’’ होता है, गुण सूत्र होता है, व्यक्ति वैसा ही बन जाता है।यह जीन सभी संस्कार सूत्रों तथा सारे विभेदों का मूल कारण हैं। वंश-परम्परा विज्ञान (उाहाूग्म् एम्गहम) की भाषा में कहा जाता है कि एक-एक जीन पर साठ-साठ लाख आदेश लिखे हुए होते हैं तो कर्मशास्त्र की भाषा में कहा जा सकता है कि कर्म स्कन्ध में अनन्त आदेश लिखे होते हैं। अभी तक वंश-परम्परा विज्ञान (उाहाूग्म् एम्गहम) ‘जीन’ तक ही पंहुच पाया है और यह ‘जीन’ स्थूल शरीर का ही घटक है, किन्तु कर्म सूक्ष्म शरीर का घटक है। इस स्थूल शरीर के भीतर तैजस शरीर है, विद्युत शरीर है। वह सूक्ष्म शरीर है। कर्म शरीर-सूक्ष्मतम है। इसके एक-एक स्कन्ध पर अनन्त-अनन्त लिपियॉ लिखी हुई हैं। हमारे पुरुषार्थ का, अच्छाइयों का, बुराइयों का, न्यूताओं और विशेषताओं का सारा लेखा जोखा और सारी प्रतिक्रियाएं कर्म शरीर में अंकित रहती हैं। वहां से जैसे स्पंदन आते हैं, आदमी वैसा ही व्यवहार करने में लग जाता है।२

प्राण से तात्पर्य जीवन शक्ति है। जिसके संयोग सेजीपजीन अस्था को प्र्राप्त करता हो और वियोग से मरण अवस्था को प्राप्त हो उसको प्राण कहते है।पांचों ही इन्द्रियों की जो ज्ञान करने की शक्ति है उसे कहते हैं – पांच इन्दिय प्राण । मनन करने, बोलने और शारीरिक क्रिया करने की शकित को कहते है- मनोबल, चनबल और कायबल। बल और प्राण एक ही हैंं। पुदगलों को शसोच्छ्वास के रूप में ग्रहण करने और छोड़ने की शक्ति-शसोच्छ्वास पाण कहलाती है। इस प्रकार अमुक भव में अमुक काल तक जीवित रहने की शक्ति को कहते है- आयुष्य प्राण।३

प्राण का संबंध पर्याप्ति के साथ है। प्राण जीव की शक्ति है और पर्याप्ति जीव द्वारा ग्रहण किये हुये पुदगलों की शक्ति है। पर्याप्ति कारण है और प्राण कार्य है।जीव की मन, चन, और काया से सम्बन्ध रखने वाली कोई भी ऐसी प्रवृति नहीं, जो पुदगल द्रव्य की सहायता के बिना होती है। पांच इन्द्रिय प्राणों का कारण है- इन्द्रिय प्रर्याप्ति। मनोबल, वचनबल और कायबल का क्रमश: कारण है मन: पर्याप्ति, भाष्रूाा पर्याप्ति और शरीर पर्याप्ति। श्वसोच्छ्वास प्राण का कारण है- श्वसोच्छ्वास र्याप्ति। आयुष्यप्राण का कारण है आहार पर्याप्ति। क्योंकि आहार पर्याप्ति के आधार पर ही अपयुष्यप्राण टिक सकता है। जैन कर्म-सिद्धान्त के अनुसार इन दस प्राणों में मुख्य प्राण है-आयुष्यप्राण। शरीर की समस्त क्रियाएं और समस्त अंगों का कार्य संचालन तभी तक संभव है जब तक आयुष्यप्राण क्रियाशील है। इसके समाप्त होते ही समस्त क्रियाएं सम्पूर्ण रूप से बन्द हो जाती हैं जिसे हम मृत्यु की संज्ञा देते हैं।

जब आत्मा एक शरीर को छोड़कर दूसरा शरीर धारण करती है, तब नये जन्म के प्रारंभ में वह जैन कर्म-सिद्धान्त के अनुसार पर्याप्ति नाम-कर्म की सहायता से भावी जीवन यात्रा के निर्वाह के लिए एक साथ आवश्यक पौदगलिक सामग्री का निर्माण करती है। इसे या इससे उतपन्न होने वाली पौदगलिक शक्ति को पर्याप्ति कहते हैं। पर्याप्तियों का क्रम इस प्रकार है- आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छ्वास, भाषा और मन: पर्याप्ति। कुल छ: पर्याप्तियों हैं। छहों पर्याप्तियों का आरम्भ एक काल में होता है, परन्तु उनकी पूर्णता क्रमश: होती है। इसलिए इस क्रम का नियम रखा गया है। आहार पर्याप्ति को पूर्ण होने में एक समय अ‍ैर शरीर पर्याप्ति आदि पांचों में से प्रत्येक को अन्तर्मुहूर्त लगता है। आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छ्वास, भाषा, मन: पर्याप्तियों के माध्यम से जीव आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छ्वास भाषा और मन के योग्य पुदगलों को ग्रहण करते हैं। उन्हें तदनुरूप परिणत करते हैं और असार पुदगलों को छोड़ देते हैं।४

वंश-परम्परा विज्ञान के अन्र्तगत ‘‘जीन्स’’ को कर्म७सिद्धान्त के अन्तर्गत शरीर पर्याप्ति के रूप में माना जा सकता है। पर्याप्ति का अर्थ जीवनोपयोगी पुदगलों की शक्ति के निर्माण की पूर्णता। सबसे कम विसित प्राणी में मकम से कम स्पर्शइन्द्रिय प्राण, कायबल, शसोच्छ्वासप्राण, आयुष्यप्राण कुल चार प्राण तािा आहार पर्याप्ति, शरीर पर्याप्ति, इन्द्रिय पर्याप्ति और श्वासोच्छ्वास कुल चार पर्याप्ति अवश्य होती हैं। इस प्रकार जैन कर्म-सिद्धान्त के अनुसार प्राणों तथा पर्याप्तियों के याग से प्राणी का जीवन क्रम चलता है। कोशिकाओं में जो वृद्धि विभाजन विशिष्टता भिन्नता आदि क्रियायें होती हैं वह सब इन पर्याप्तियों का ही हिस्सा हैं। इन पर्याप्तियों का नियंत्रण कर्मों द्वारा होता है। कोशिकाओं की मृत्यु होती है तथा अनेक कोशिकाओं द्वारा निर्मित बहुकोशीय प्राणी की भी मृत्यु हो जाती है।यह मृत्यु आयुष्य कर्म के हिसाब से होती है। जितना जिसका आयुष्य होगा, उतने वर्ष तक जीवित रहेगें।

व्यक्ति के व्यवहार, आचार, विचार और प्रत्येक क्रिया कलाप का अंकन व्यक्ति के भीतर निरंतर होता रहता है। ऐसा आज विज्ञान की अनेक शाखऐं भी मानने लगी हैं। आज वही अंकन कालांतर से उस व्यक्ति को प्रभावित करता है।भारतीय दर्शनों ने इस अंकन प्रणाली को कर्म-सिद्धान्त के स्रूप में विस्तृत विवेचना की है। आधुनिक विज्ञान उस अंकन की विभिन्न पद्धतियों ओर संस्थानों की चर्चा को आधार बनाती है। हमारा मस्तिष्क भी हमारे क्रिया-कलापों को रिकार्ड करता है। हमारी प्रतिरोधात्मक कोशिकाऐं भी एना अंकनल करती हैं और अंतत: उन सभी अंकनों का आधार बनता है संस्कार सूत्र ‘‘जीन्स’’। इन दोनों के स्वतंत्र अध्ययन से जहां दोनों को समझने में सुविधा होगी वही आधुनिक परिपेक्ष्य में समस्याओं को सुलझाने में माग्रदर्शन मिलेगा।

कर्म सिद्धान्त अति सूक्ष्म है। बुद्धि से परे का सिद्धान्त है। वंश-परम्परा विज्ञान ने कर्म सिद्धान्त को समझने में सुविधा प्रदान की है। जीन व्यक्ति के आनुवांशिक गुणों के संवाहक हैं। प्रत्येक विशिष्ट गुण के लिए विशिष्ट प्रकार का जीन होता है। ये आनुवांशिकतइा के नियम कर्मवाद के संवादी नियम है। यह स्थूल शरीर सूक्ष्म कोशिकाओं से निर्मित्त है। मासनव शरीर में लगभग साठ-सत्तर खरब कोशिकाऐं हैं। इन कोशिकाओं में गुणसूत्र होते हैं, जिन्हें क्रोमोसोम कहते हैं। प्रत्येक गुणसूत्र दस हजार जीन से बनता है। जीन सारे संस्कासूत्र है। मानव शरीर की प्रत्येक कोशिका में छियालीस क्रोमोसोम होते हैं। इन्हें वंश सूत्र की संज्ञा भी दी गई है। जीव विज्ञान के अनुसार प्रत्येक कोशिका या बीजकोष में २३ पिता के तथा २३ माता के वंश सूत्रों का समागम होता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इनके संयोग से १६, ७७, २१६ प्रकार की विभिन्न संभावनाऐं अपेक्षित हो सकती है।५ यदि तुलनातमक दृष्टि से देखा जाये तो वातावरण, परिस्थिति, पर्यावरण, भौगोलिकता, आनुवांशिकता, जीन और शरीर का ग्रन्थियों के विभिन्न स्रावों द्वारा रासयायनिक परिवर्तन से सभी कर्म सिद्धान्त के संवादी सूत्र है।

जीन हमारे स्थूल का अवयव है और कर्म हमारे सूक्ष्मतम शरीर का अवयव है। दोनों शरीर से जुड़े हुए है, एक स्थूल शरीर से और दूसरा सूक्ष्मतम शरीर से। यह सक्ष्मतम शरीर कर्म शरीर है। मृत्यु का संबंध केवल स्थूल शरीर से है। सूक्ष्म शरीर मरणोपरान्त भी विद्यमान रहता है। जैन दर्शन में जिसे सूक्ष्म शरीर (तैजस, कार्मण) कहा गया है सांख्य में उसे लिंग शरीर कहा जाता है।संसारावस्था में निरंतर साथ रहते हैं। इस चर्चा को वैज्ञानिक संदर्भ में निम्न प्रकार समझा जा सकता है। वैज्ञानिक पर्दाथ की चार अवस्थाएं मानते हैं : ठोस, द्रव्य, गैस व प्लाज्मा। एक अवस्था और खोजी गई जिसे प्रोटोप्लाज्मा या जैवप्लाज्मा कहा जाता है। अध्यात्म-योग की भाषा में प्रोटोप्लाज्मा हमारी प्राण शक्ति है, जो हमारे अस्तित्व का सटीक प्रमाण है। वैज्ञानिकों का यह कहना कि प्रोटोप्लाज्मा अमर तत्व है। मृत्यु के पश्चात् भी यह रसायन, जो हमारी कोशिकाओं में रहता है, शरीर से अलग होकर वायुमंडल में विखर जाता है। वही प्रोटोप्लाज्मा निषेचन की क्रिया के समय ‘जीन्स’ में शिशु के साथ पुन: चला जाता है।६ वंश परम्परा विज्ञान की भाषा में पृथ्वी में भी कुछ अति सूक्ष्म जीव होते हैं जिन्हें विषाणु कहते हैं। इनमें केन्द्रक नहीं होता हैं, कोशिका नहीं होती है। ये विषाणु जैसे ही किसी जीवित माध्यम के समपर्क में आते हैं तो इनकी असंख्यात गुना वृद्धि होती है। जिनका शरीर एक कोशिका से बनता है उसे बैक्टीरिया कहते हैं। उसमें एक केन्द्रक होता है। केन्द्रक में DNA होता है। उसमें वंश वृद्धि के गुण होते हैं। इसी कारण यह एक कोशीय जीव चयापचय की क्रिया करता है। वंश-वृद्धि का घटक तत्व DNA है, जो एक कोशीय जीव में पाया जाता है।७

क्लोनिंग अर्थात प्राणी प्रतिलिपिकरण

किसी जीव विशेष का जैनेटिकल प्रतिरूप पैदा करना अर्थात डोनर पेरेन्ट (नर या मादा कोई एक) की हू-ब-हू शक्ल सूरत (प्रतिलिपि) पैदा कर देना क्लोनिंग कहलाता है। इसे जैन कर्म-सिद्धान्त के अनुसार शरीर-नाम-पर्याप्ति कर्म के विपाक का फलित माना जा सकता है। किसी भी जीव के गुणों का निर्धारण उसकी घटक कोशिकाओं के आधे आधे गुणसूत्रों (वंशसूत्र) मिलकर एक नई रचना करते हैं। जिनमें माता पिता के गुण मिले रहते हैं।क्लोनिंग में मात्र नर अथवा मादा की सामान्य दैहिक कोशिकाओं के गुणसूत्रों के द्वारा सन्तान उत्पन्न की जाती है जो स्वाभाविक रूप से उनके दाता व्यक्ति (जनक) जैसी ही होती है। अविकसित जीवों, पेड-पौधों आदि में तो यह क्रिया कायिक प्रजनन, अलैंगिक प्रजनन आदि के रूप में प्राकृतिक रूप में पाई जाती है। परन्तु आधुनिक वैज्ञानिकों ने विकसित जीवों चूहों, भेड़ों एवं मनुष्यों तक को इस विधि से उत्पनन करना शुरू कर दिया है।

स्तनधारी पशुओं में क्लोन बनाने की तकनीक

प्रतयेक पशु तथा वनस्पति में अनेक कोशिकाऐं पाई जाती हैं। मनुष्य के शरीर में इन कोश्यिाकाओं की कुल संख्या लगभग ६०-७० खरब है। प्रत्येक कोशिका अपने आप में पूर्ण जीवित इकाई होती है। कोशिका के केन्द्र में नाभिक होता है जिसे केन्द्रक भी कहते हैं। केन्द्रक के अन्दर उस जीव के गुणसूत्र (वंशसूत्र) होते हैं। मनुष्य की कोशिका में गुणसूत्र की संख्या ४६ होती हैं। इन गुणसूत्रों में ही आनुवांशिकी के सभी गुण मौजूद होते हैं। गुणसूत्रों की रचना डी.एन.ए. (DNA) तथा आर.एन.ए. (RNA) नामक रसायनों से निर्मित होती है। इन गुणसूत्रों पर जीन स्थित होते हैं। कोशिका के केन्द्रक के चारों ओर एक जीव-द्रव होता है जिसे प्रोटोप्लाज्मा कहते हैं।

नर के शुक्राणु तथा मादा के अण्डाणु भी परिपक्त कोशिकाएं होती हैं। इनमें द्विगुणन द्वारा वृद्धि नहीं होती। स्तनधारी पशुओं में लेंगिक प्रजनन होता है। इस प्रक्रिया में शुक्राणु, अण्डाणु के साथ मिलकर एक नई कोशिका का निर्माण होता है। इस नई कोशिका में द्विगुणन करने की क्षमता होती है जिससे वह भ्रूण में परिवर्तित हो जाता है। इस कोशिका के केन्द्रक में गुणसूत्रों की संख्या तो ४६ होती हैं, लेकिन इनमें से आधु गुणसूत्र नर के तथा शेष आधे मादा के होते हैं। इसके विपरीत क्लोनिंग द्वारा उत्पन्न नई कोशिका में सारे के सारे गुण सूत्र किसी एक के ही होते हैं।

स्तानधारी पशुओं में क्लोन पैदा करने की प्रक्रिया कुछ इस प्रकार से है – इसके लिए सर्वप्रथम मादा के एक स्वस्थ अण्डाणु को काम में लिया जाता है। इस अण्डाणु में से विशेष तकनीक द्वारा केन्द्रक को अलग कर दिया जाता है तथा उस केन्द्रक-विहीन कोशिका को एक सुरक्षित स्थान पर कल्चर मीडियम में डूबोकर रख दिया जाता है। अब हमें जिस प्रकार के जीव का कलोन तैयार करना है उस प्रकार के डोनर पेरेन्ट की त्वचा में से कोशिका अलग कर दी जाती है। इस कोशिका के केन्द्रक को बड़ी सावधानीपूर्वक अलग कर दिया जाता है। इस केन्द्रक को पूर्व में सुरक्षित की गई केन्द्रक-विहीन कोशिका में प्रतिस्थापित कर दिया जाता है। इस प्रकार एक नई कोशिका पेदा हो जाती है जिसका केन्द्रक डोनर पेरेन्ट की कोशिका का केन्द्रक होता है। इस प्रकार नई कोशिका में गुणसूत्र वे ही होते हैं जो डोनर पेरेन्ट के होते हैं। यही नई कोशिका द्विगुणन द्वारा भ्रूण में परिवर्तित हो जाती है। इस भ्रूण को किसी भी मादा के गर्भाशय में स्थित कर दिया जाता है जहां वह सामान्य रूप से विकसित होने लगता है। इस प्रकार नवजात पेदा होता है उसमें गुणसूत्र वे ही होते है जो डोनर पेरेन्ट के होते हैं, अत: उसकी शक्ल सूरत हू-ब-हू डोनर पेरेन्ट जैसी ही होती हैयानि की वह डोनर पेरेन्ट की कार्बन कॉपी ही होता है। इस प्रकार हम जिसका प्रतियप (कॉपी-क्लोन) तैयार करना चाहते हैं उसका केन्द्रक मादा के केन्द्रक-विहीन अण्डाणु में प्रतिस्थिापित करना होगा। यदि हम नर का क्लोन तैयार करना चाहते हैं तो उसकी कोशिका का केन्द्रक और यदि मादा का क्लोन तैयार करना चाहते हैं तो मादा की कोशिका का केन्द्रक मादा के केन्द्रक-विहीन अण्डाणु में प्रतिस्थापित करना होगा।८

जैन कर्म सिद्धान्त तथा मानव क्लोनिंग

जैन धर्मानुसार जीवन की विभिन्न क्रियाओं, रचनाओं तथा घटनाओं का नियंत्रण कर्मों के द्वारा होता है। विभिन्न जीवों को मिलने वाले अलग अलग शरीर, आयु, गोत्र, सुख-दु:ख आदि का निर्धारण विभिन्न कर्म करते हैं। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं की जीवन का पूर्ण संचालप कर्मों के द्वारा ही होता है। वस्तुत: कर्म तो परिस्थितियों का निर्माण करते हैं किन्तु उन कर्मों के अनुसार आचरण करना या नहीं करना इसमें जीव स्वतन्त्र है। आत्मा कर्मों के कारागार में बंधी अवश्य है परन्तु वह अपने पुरुषार्थ के द्वारा कर्मों के फल में परिवर्तन कर सकती है। चेतना की स्वतन्त्र शक्ति के द्वारा कर्मों पर विजय पाना ही जिनधर्म हैं।

अब यहाँ सवाल यह है कि जब वैज्ञानिक ही मानव तथा अन्य जीवों के लिए विभिन्न गुणों का निर्धारण करने लगे हैं तो जैन कर्म-सिद्धान्त कहां लागू होता हैं ?शरीर में किसी प्रकार का परिवर्तन करना क्या कर्म सिद्धान्त को चुनौती नहीें है? इस विषय में यह कहना उचित होगा कि एक अपराधी किसी व्यक्ति का अंग भंग कर देता है या कोई व्यक्ति शल्यक्रिया के द्वारा अंग परिवर्तित करवा लेता है अथवा कोई मानसिक उपचार के द्वारा अपराधी प्रवृति से छुटकारा पा लेता है या फिर जहर/दुर्घटना से असमय में मृत्यु को प्राप्त हो जाता है, तो यह सब कर्म सिद्धान्त के लिए चुनौती नहीं माने जा सकते। यही कार्य अब और भी व्यवस्थित रूप से परन्तु अप्राकृतिक, अनैतिक रूप से क्लोनिंग प्रक्रिया के द्वारा वैज्ञानिक कर रहे है। एक समान मनचाहे जीवों को पैदा करने की बात भी बिल्कुल अधुरी है। एक जैसी शक्ल सूरत शरीर बन जाने का यह अर्थ नहीं होता कि उसका व्यक्तित्व ओर व्यवहार भी एक जैसा हो अर्थात यह जरुरी नहीं की अपराधी का क्लोन अपराधी तथा वैज्ञानिक का क्लोन वैज्ञानिक ही बने। लोगों को लगता है कि क्लोनिंग के द्वारा किसी भी जीव को वैज्ञानिक सुनिश्चित रीति से बना सकते है परन्तु ऐसा नहीं है। पहली क्लोन भेड़ का निर्माण इस संबन्ध में किए गए २७७ परीक्षणों की असफलता के बाद हुआ था तथा मानव क्लोनिंग के १०० में से १ या २ मामलों में सफलता मिली है।९ जो जीव कई बार की असफलताओं के बाद बनते भी हैं तो वह दरअसल वैज्ञानिकों के द्वारा नहीं बनते हैं। वैज्ञानिक तो मात्र एक निश्चितशरीर रचना के अनुकूल परिस्थितियां देते हैं। उसमें जीव/आत्मा का आविर्भाव उनके बस के बाहर की हैं। क्लोनिंग सिर्फ शरीर के स्तर तक जुड़ी हुई हैं जबकि आत्मा तथा पुनर्जन्म का सिद्धान्त वैज्ञानिकों और वैज्ञानिक प्रयोगशालों की सीमाओं से परे हैं। आत्मा तथा पुनर्जन्म का आभास सत्यान्वेषी अहिंसक मानवों को होता है। इसे अभी वैज्ञानिक भी पूरे आत्मविश्वास तथा प्रमाणों के साथ नकार नहीं सके हैं। कारण स्पष्ट है कि इनके अस्तित्व के सम्बंध में संसार भर में असंख्य प्रमाण/घटनाएं हर समय होती रहती हैं।१०

जैन धर्म तथा प्रौघोगिकी

जीव विज्ञान की आधुनिक विकसित शाखा जैव प्रौघोगिकी में मानव जीनोम परियोजना, जैनेटिक अभियांत्रिकी, जैनेटिकसङ्कारी तथा मानव क्लोनिंग आदि का अध्ययन, अन्वेषण किया जाता है। इसके नूतन अनुसंधानों के द्वारा जीवों के गुणसूत्रों पर स्थित जीन्स (संस्कारसूत्र) के कई गुण धर्मों का पता चल रहा है। जीवों की विभिन्न दशाओं-बुढ़ापा, अपराध, बीमारियां आदि का नियमन भी इन संस्कार सूत्रों से होता है तथा इनके परिवर्तन के द्वारा मनोवांछित जीवन बनाने का दावा वैज्ञानिक कर रहे हैं। जीनों तथा जैनेटिक कोड के इस गुणधर्म को ध्यान में रखते हुये जेनेटिक कोड़ों और कर्म परमाणुओं के बीच सम्बंधों पर परिकल्पना वैज्ञानिकों को दी गई है जिस पर कुछ वैज्ञानिक व्यापक अनुसंधान भी कर रहे हैं।

पहले तो हमें यह समझ लेना चाहिए की जीन तथा जैनेटिक कोड सर्वोपरि नहीं हैं तथा उन पर शारीरिक, वातावरण, आंतरिक तथा बाह्य परिस्थितियां भी नियंत्रण रखती है। जीवन के क्रियाकलाप उसे स्वयं के शरीर के साथ-साथ दूसरें जीवों के क्रियाकलापों तथा अन्य बाह्य परिस्थितियों द्वारा संचालित होते हैं। इन जीनों तथा इनकों प्रभावित करने वाले उक्त कारण ही अन्तत: कर्म-परमाणुओं की संभावानओं को सूचित करते हैं जिनके संबंध में वैज्ञानिक वर्ग फिलहाल पूर्णत: मोन हैं। अगर वैज्ञानिक जैन कर्म-सिद्धान्त को समझकर जीवों के विभिन्न कार्य-सच्चाई-झूठ, अहिंसा-अपराध, जीवदया-व्रूरता पर सतत् अन्वेषण करें तो वे इस महान जैन कर्म-सिद्धान्त को सत्य सिद्ध पाएंगे।

जैन कर्म-सिद्धान्त के अनुसार जीव के शरीर की रचना उसके नाम-कर्म के कारण होती हैं। कोई जीव कैसी शक्ल-सूरत प्राप्त करेगा उसका निर्धारण इसी नामकर्म से होता है। लेकिन यहां तो क्लोन से शरीर की रचना मनुष्य के अपने ही हाथें में आ गई है। हम जैसी शक्ल-सूरत बनाना चाहते हैं बना सकते है। ऐसी स्थिति में नामकर्म की अवधारणा अर्थहीन हो गई है। लेकिन ऐसा सोचना सही नहीं हैं। वस्तुस्थिति समझने के लिए हमें जैन कर्म-सिद्धान्त को गहराई से समझना होगा।

सबसे पहले तो हमें स्पष्ट करना होगा कि प्रत्येक घटना मात्र कर्म से घटित नहीं होती। आचार्य महाप्रज्ञजी ने अपनी पुस्तक कर्मवाद में लिखा हैं – ‘‘कर्म से ही सब कुछ नहीं होता। यदि हम कर्मों के अधीन ही सब कुछ घटित होना माल लेंगे तो यह वेसी ही व्यवस्था हो जाएगी जैसी कि ईश्वरवादियों की हैं कि जो कुछ होता है वह ईश्वर की इच्छा से होता है या फिर उन नियतिवादियों की स्थिति है कि सब कुछ नियति के अधीन है, हम उसमें कुछ भी फैर-बदल नहीं कर सकते। यदि कम्र ही सब कुछ हो जाए तो उनको क्षय करने के लिए न तो पुरुषार्थ का ही महत्व रह जाएगा और न ही मोक्ष संभव होगा क्योंकि जैसे कर्म होंगे वैसा ही उनका उदय होगा और उस उदय के अनुरूप ही मि कार्य करेंगे तथा नए कर्मों का बंधन करेंगे। इससे पुरुषार्थ तथा मोक्ष की बात गलत सिद्ध हो जाएगी।’’ अब यह स्पष्ट है कि कर्म ही सब कुछ नहीं हैं।१२

आचार्य श्री महाप्रज्ञजी आगे स्पष्ट करते हुए लिखते हैं – ‘‘कर्म एक निरंकुश सत्ता नहीं है। कर्म पर भी अंकुश है। कर्मों में परिवर्तन भी किया जा सकता है। भगवान महावीर ने कहा – ‘किया हुआ कर्म भुगतना पड़ेगा’। यह सामान्य नियम हैं, लेकिन इसमें कुछ अपवाद हैं। कर्मों में एदीरणा, उदवर्तन, अपवर्तन तथा संक्रमण संभव हैं जिसके द्वारा कर्मों में परिवर्तन भी किया जा सकता है। सामान्य शब्दों में हम कह सकते है कि पुरुषार्थ द्वारा कर्मों की निर्जरा समय से पहले की जा सकती है। कर्मों की काल-मर्यादा और तीव्रता को बढ़ाया और घटाया भी जा सकता है तथा सजातीय कर्म एक भेद से दूसरे भेद में बदल सकते हैं। उदय में आने वाले कर्मों के फल शक्ति को कुछ समय के लिए दबाया जा सकता है तथा काल विशेष के लिए पुन: फल देने में अक्षम भी किया जा सकता है, इसे उपशम कहते है।’’१३

आचार्य महाप्रज्ञजी का मानना है – ‘‘संप्रमण का सिद्धान्त जीन को बदलने का सिद्धान्त है।’’१४ एक विशेष बात यह भी ध्यान देने योग्य है कि कर्मों का विपाक (फल) द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव के अनुरूप होता हैं। व्यक्तित्व के निर्माण में कर्म ही सब कुछ नहीं होते हैं बल्कि आनुवांशिकता, परिस्थिति, वातावरण, भौगोलिकता, पर्यावरण यह सब मनुष्य के स्वभाव और व्यवहार पर असर डालते हैं। आयुष्य भी एक कर्म हैं लेकिन बाह्य निमित्त जहर आदि के सेवन से आयुष्य को कम कर दियया जाता हैं। इसी प्रकार कोशिका के गुणसूत्रों में अवस्थिति जीन्स (संस्कारसूत्र) में परिवर्तन करके शक्ल-सूरत में परिवर्तन किया जा सकता है क्योंकि जैन कर्म-सिद्धान्त के अनुसार संक्रमण द्वारा यह संभव है। अत: हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि जैन कम-सिद्धान्त के अनुसार मानव जीनोम परियोजना, जैनेटिक अभियांत्रिकी, जैनेटिक सर्जरी, मानव क्लोनिंग द्वारा एक ही शक्ल-सूरत वाले जीव पैदा करना, कोशिका के केन्द्रक को परिवर्तित कर देना संभव है। अत: वंश-परम्परा विज्ञान कर्म सिद्धान्त के लिए कोई चुनोती नहीं हैं बलिक जैन कर्म-सिद्धान्त को व्यवस्थित तरीके से समझ लेने पर वंश-परम्परा विज्ञान की व्याख जैन कर्म-सिद्धान्त के आधार पर आसानी से की जा सकती है।

जैन कर्म-सिद्धान्त और वंश- परम्परा विज्ञान दोनों का गहन अध्ययन व शोध कर जन-मानस तक यह तथ्य उजागर करना चाहिए कि हर प्राणी पुरुषार्थ कर संक्रमण के द्वारा अशुभ कर्मों को शुभ में बदल सकता है तथा त्याग, संयम, संवर और निर्जरा के द्वारा स्थूल शरीर के ‘जीन्स’ के स्वरूप को भी बदला जा सकता है। वंश-परमपरा विज्ञान की शेध कर यह उदघटित करना चाहिए कि किसी भी प्राणी के जख्मी ‘जीनस’ के स्थान पर स्वस्थ्य ‘जीन्स’ का प्रत्यारोपण कर स्थूल शरीर को उन्नत किया जा सकता है।

समाजिक उपयोगिता

इस शोध कार्य से संसारी आत्मा की शुभ-अशुभ प्रवृति से चिपकने वाले शुभ-अशुभ कर्मों की जानकारी मानव-जगत को मिलेगी जिससे व्यक्ति अनैतिकता एवं हिंसा करने में संकोच करेगा। प्राणी मात्र के स्थूल शरीर रचना में ‘जीन्स’ किस प्रकार अपना योगदान देते हैं, जैसा ‘जीन्स’ वैसा स्थूल शरीर का महत्व जन-मानस को प्रकट होगा, जिससे वे अपने ‘जीन्स’ के शद्धिकरण के बारे में सचंत होगें। हमारी आत्मा चिन्तन व पुरुषार्थ में स्वतंत्र है, परन्तु कर्मों की बद्धता के कारण परतंत्र है। आत्मा त्याग, संयम, संवर, निर्जरा करके प्राणी अपनी आत्मा की शुद्धि करके स्थायी सुखानुभूति प्राप्त कर सकता है। ‘भाव परिवर्तन’ द्वारा कर्मों कर निर्जरा तथा ‘जीन्स’ का रूपान्तरण किया जा सकता है। इस शोध से सूक्ष्म एवं स्थूल शरीर शुद्धिकरण का सूत्र जन-मानव के हाथ लगेगा तो वह भावों की शुद्धि करके एक अच्छे समाज, राष्ट्र तथा विश्व का निर्माण हो सकेगा। यह शोध वर्तमान भावात्मक युगीन समस्याओं परग्रिह, आतंकवाद, हिंसा, जनसंख्या-वृद्धि, लूट-खसोट, कदाग्रह, गरीबी, बीमारी का स्थायी समाधान दे सकता है। इस शोध कार्य से उदघाटित होगा कि वंश परम्परा विज्ञान की शाखा क्लोनिंग तकनीक से विभिन्न अंगों को प्रयोगशाला में ही विकसित किया जा सकता है जिससे कई असाध्य रोगों को दूर करने में आसानी होगी। इसके अलावा इस तकनीक से विभिन्न बेकार जीन्स को बदला जा सकेगा तथा बुढ़ापे को रोका जा सकेगा। इसी चिकित्सकीय उपयोगिता को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने जनवरी २००१ में मानव क्लोनिंग की इजाजत दे दी है।१५

जैन कर्म-

सिद्धान्त के अनुसार कर्मबद्ध आत्मा ही नये कर्मों का संचय करती है। कर्म का बीज है- राग-द्वेष। मुक्त आत्मा कर्म संचय नहीं करती कयोंकि उसके राग-द्वेष नष्ट हो चुके होते हैं। कर्म क्षय करने में जैन धर्म का पुरुषार्थ एवं प्रयत्न में अटूट विश्वास है। जैन साधना पद्धति का उद्देश्य संवर, निर्जरा के द्वारा कर्मों का क्षय कर मोक्ष की प्राप्ति करना है। संक्रमणकरण, उदवर्तना, अपवर्तना तथा उदीरणा आदि के द्वारा पूर्वबद्ध कर्मों की स्थिति को, अनुभाग को घटाया बढ़ाया जा सकता है। इसके लिए समता भाव की साधना, आराधना करते हुए तप रूप निर्जरा को जीवन का अंग बनाना आवश्यक है।

जीन हमारे स्थूल शरीर का अवयव है और कर्म हमारे सूक्ष्मतम शरीर का अवयव है। ‘‘जीन्स’’ व्यक्ति के आनुवांशिक गुणों के संवाहक है। प्रत्येक विशिष्ट प्रकार के गुण के लिए विशिष्ट प्रकार का जीन होता है। यह तीन कर्मवाद के संवादी हैं। वंश-परम्परा विज्ञान में क्लोनिंग तकनीक के द्वारा मानव के विभिन्न अंगों को प्रयोगशाला में ही विकसित किया जा सकता है, जिससे कई असाध्य रोगों को दूर करने में आसानी होगी। इसके अलावा इस संक्रमण का सिद्धान्त जीन को बदलने का सिद्धान्त है। ‘‘भाव परिवर्तन’’ द्वारा कर्मों की निर्जरा तथा जीन्स का रूपान्तरण किया जा सकता है।

निष्कर्ष

वैज्ञानिकों के सामने एक चुनौती है कि जब जीन ही शरीर के प्रत्येक कार्य पर नियंत्रण रखता है तब जीन को कौन नियंत्रित करता है ? इसका उत्तर उनके पास नहीं है। इस समस्या का उत्तर जैन दर्शन की कर्म-व्यवस्था द्वारा दिया जा सकता है। इन जीनों (उाहो) को कर्म नियंत्रित करते हैं। कर्म ही समय-समय पर जीनों को निर्देश देते हैं कि उन्हें आगे क्या कार्य करना है फिर जीन उसी के अनुरूप कार्य करते हैं अर्थात् औदारिक शरीर के निर्माण में जीन कर्म के संवादी तत्व हैं।

सन्दर्भ ग्रन्थ :- १. तत्वार्थसूत्र २१८ आचार्य उमास्वाति, विवेचक पं. सुखलाल संधवी जै संस्कृति संशोधन मंडल बनारस, १९५२ २. कर्मवाद- युवाचार्य (वर्तमान आचार्य) महाप्रज्ञ, आदर्श साहित्य संघ, चरू (राज.), द्वितीय संस्करण, १९८६, पृ. १३७ ३. जीव-अजीव- आचार्य महाप्रज्ञ, जैन विश्व भारती लाडनूँ (राज.) बारविां संस्करण, १९८६, पृ. २२ ४. वही पृ. १८ ५. मनोविज्ञान और शिक्षा, डॉ. सरयू प्रसाद चौबे, लक्ष्मीनरायन प्रकाशन, आगरा, १९६० पृ. १६१ ६. आचारांग प्रथम अध्ययन: एक अनुशीलन, पृ. १० ७. वही पृ. १४ ८. जीवन क्या है : डाू. अनिल कुमार जैन, इन्दौर पृ. ९५ ९. वर्मा, संजय, मानव क्लोनिंग विज्ञान प्रगति (नई दिल्ली) मार्च २००३ पृ. १९ १०. अजित जैन ‘जलज’ अर्हत् वचन, जनवरी-मार्च २००४, पृ. ४९ ११. अजित जैन ‘जलज’ कर्म सिद्धान्त की जीव वैज्ञानिक परिकल्पना, अर्हत् वचन (इन्दौर) जुलाई १९९९ पृ. १७-२२ १२. कर्मवाद – युवाचार्य (वर्तमान आचार्य) महाप्रज्ञ पृ. १३२ १३. वही पृ. १०२ १४. वही पृ. १३२ १५. वर्मा संजय, मानव क्लोनिंग, विज्ञान प्रगति (नई दिल्ली) मार्च २००३ पृ. २०

सोहनराज तातेड़
अर्हत वचन अक्टूवर-दिसम्बर २००७ पृ. ०३ से १० तक

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