तत्वार्थ सूत्र-आधुनिक परिप्रेक्ष्य में

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Tattvartha_Sutra__Jain_textसंसारी जीवों में मनुष्य का जीवन सर्वोत्कृष्ट है। यह भौतिक एवं भावात्मक धरातलों पर इतनी सूक्ष्मता से एकमेक है कि भावों की सत्ता और प्रवाह उसे समझ नहीं आते—मात्र प्रभावों में वह डूबता उतराता अपना जीवन बिता देता है। भाव और इच्छाएँ उसे घेरे में लेकर सागर सी लहरों पर लहर और लहरों में लहर देकर शरमाते रहते हैं। उन्हीं की क्षणिक र्पूित—अर्पूित में वह सुख और दुख का अनुभव करता हुआ मात्र ‘‘पर’’ पदार्थों में खोया रहता है। शाश्वत सत्य का, अपने ‘‘स्व’’ अथवा ‘‘।’’ का उसे बोध ही नहीं हो पाता। वह ‘‘।’’ के अर्थ में शरीर तक पहुँच कर ही रह जाता है यही मिथ्यादर्शन है। इसी के प्रभाव में उसका मिथ्याज्ञान उसे मिथ्याचारित्र की ओर बहा देता है। तत्वार्थ सूत्र सम्पूर्ण शाश्वत सत्य से उसका परिचय कराकर उसे ‘‘स्व’’ तथा ‘‘पर’’ का भेद कराकर सच्चे ‘‘स्व’’ की ओर मोड़ देता है या यों कहे कि भौतिक से भावात्मक तथा भावात्मक से आत्मिक दिशा में मोड़ता है।

रचयिता साधु आचार्य उमास्वामी ने ई. पू. काल से ही श्रुत से चले आ रहे सिद्धांतों को तत्वार्थ सूत्र के रूप में प्रस्तुत करके पाठकों को संसार के सत्य से परिचित कराने हेतु विषयों को १० अध्यायों में बांटा है।

प्रथम अध्याय में

उन सभी प्रशस्त मोक्ष र्मािगयों को नमस्कार करते हुए जिन्होंने रत्नत्रय धारण कर जीवों को मार्ग दर्शाया है, सात तत्वों का वर्णन किया है जिससे कि पाठक को मोक्ष, बंध, पाप, पुण्य, संवर, निर्जरा एवं जीव का बोध हो। साथ ही साथ जीव का लक्षण, ज्ञान, ज्ञान के प्रकार, महत्व एवं आत्मा के अस्तित्व का बोध कराया है।

दूसरे अध्याय में

—‘‘स्व’’ भावों के सूक्ष्म भेद दर्शाते हुए ‘‘उपयोग’’ का भान कराया है कि संसारी जीवों के वर्गीकरण में इंद्रियों पर आधारित अनुभूतियों से भाव किस प्रकार स्वतंत्र और भिन्न हैं। भावों द्वारा किस प्रकार कर्मयोग एवं कर्मबंध होता है। वर्तमान जन्म स्थिति से छूटकर किस प्रकार ‘‘गति’’ बनती है और उसी के अनुकूल श्रेणी। तब पुनर्जन्म की जीव के लिए कैसी — कैसी संभावनाए होती हैं पर्यायें और फिर शरीर जन्म। शरीरों के प्रकार आदि अति सूक्ष्म वर्णन प्रस्तुत किया गया है जिसे आधुनिक विज्ञान तथा Thermodynamics के परिप्रेक्ष्य में नकारा नहीं जा सकता है।

तृतीय अध्याय में

—दृष्ट संसार की उस भौगोलिक रचना से जो श्रुतकाल में वर्तमान थी (लगभग पुरानी—अर्थात् जब धरती इकट्ठी एवं थालीनुमा थी) तथा आज भी नकारी नहीं जा सकती, अदृष्ट संसार की अनुभूतियों एवं परिस्थितियों से जोड़ते हुए संपूर्ण ब्रह्मांड की विवेचना की गई है। ताकि व्यक्ति इस त्रिलोक संस्थान में अपना तुच्छ भौतिक अस्तित्व समझते हुए भी इस संसार में अपनी आत्मा के पुरूषार्थ की असीम गरिमा को समझ सके।

चतुर्थ अध्याय में—

अदृष्ट संसार के जीवों का वर्णन करते हुए भावों की लेश्याओं से परिचित कराया है किस प्रकार उसे ध्यान में रखते हुए व्यक्ति भावों में न बहकर अपनी भाव उन्नति बनावे।

पंचम अध्याय में

—शाश्वत षट्द्रव्यों का वर्णन करते हुए (जीव की गति एवं स्थिति में धर्म तथा अधर्म का उपकार, अवगाहन में आकाश का उपकार, सुख, दुख, जीवन—मरण में पुद्गल के उपकार, जीव पर जीवों के उपकार स्वरूप निमित्त होना, क्रिया, परिणाम, परत्व अपरत्व एवं परिवर्तन में काल के उपकारादि), उनके परस्पर एक दूसरे पर उपकार दर्शाए हैं। इस अध्याय में आधुनिक भौतिकी एवं रसायन के अकाट्य सिद्धांतों के भी वर्णन हैं—जिनके द्वारा उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य के सिद्धांत से द्रव्य का लक्षण, पौद्गलिक विस्तृत विवेचना और गुणों की परिभाषा प्रस्तुत की गई है।

छठे अध्याय में

—मन, वचन और काय की क्रिया को ‘‘योग’’ बतलाते हुए कर्मों का (मन द्वारा भावों के निमित्त) आस्रव, तथा उसके रूप एवं प्रभावों की विस्तृत चर्चा की है। इस प्रकार कर्मबंध में मात्र क्रिया है, भाव भी जिम्मेदार है।

अष्टम अध्याय में

—बंध के कारण, प्रकार, उनकी काल स्थिति तथा प्रकृति आदि के बारे में बतलाया है ताकि पाठक उनसे सावधान हो सके।

नवम् अध्याय में

—आस्रव के विरोध को संवर बतलाते हुए निर्जरा हेतु तप के तरीके बतलाए हैं अर्थात् ३ गुप्ति, ५ समिति, १० धर्म, १२ भावनाओं, २२ परिषहो, ५ प्रकार के चारित्र, १२ प्रकार के तप का महत्व दर्शाते हुए प्रथम तो निर्जरा के तरीके बतलाते हैं पश्चात् ५ प्रकार के निग्र्रन्थ बतलाते हुए उनका व्याख्यान किया है।

दशम अध्याय में

—दर्शाया है कि मोह का क्षय होने से ही कर्मक्षय होकर जीव की पुष्टि का मार्ग प्रशस्त होता है। जीव स्वास्तिक की चार गतियों में न भटककर केन्द्र से पंचम गति पकड़कर ऊध्र्वगमन (१५ गुण स्थानों वाला उध्र्वगमन) करता है। अंत में, मात्र ज्ञानरूप, ज्ञानमय चेतना वह मुक्त जीव लोकान्त पर, ब्रह्मांड की परिधि पर, शुद्ध ऊर्जा स्वरूप हो जाता है क्योंकि वह किसी के अधीन न रहकर ‘‘सिद्ध’’ हो जाता है। जब यह विस्तृत रहस्य किसी भी पाठक अथवा श्रोता की समक्ष में आ जाता है तब लौकिक उपलब्धियाँ, मान, इच्छाएं रह नहीं पाती और वहीं जीव परम सुखी बन जाता है।

इसी कारण तत्वार्थ सूत्र की एक भावपूर्ण वाचना, से एक दिन के व्रत का महत्व प्राप्त हुआ कहा जाता है क्योंकि उसके पठन श्रवण से चारित्र में निर्मलता एवं उत्कृष्टता आती है—इसी कारण इस ग्रंथ की ‘‘पवित्र’’ महत्ता है। कुछ समय पूर्व तत्वार्थ सूत्र को ‘‘पवित्रग्रंथ’’ मान्य कर सेंट जेम्स महल लंदन में ब्रिटेन के राजकुमार फिलिप द्वारा अन्य धर्म ग्रंथों के साथ स्वीकारा गया। SACRED BOOKS में तत्वार्थसूत्र का रखा जाना कोई विशेष बात नहीं है किन्तु उसका मर्म समझकर उपयोग मार्ग धारण करना ही विशेष है। तत्वार्थ सूत्र को इंग्लिश में ‘‘दैट व्हिज’’ के रूप में डॉ. नथमल टाटिया ने कहां तक सही प्रस्तुत किया है। यह तो पढ़कर ज्ञात होगा। आधुनिक विज्ञान मात्र भौतिक धरातल पर उलझकर रह गया है। भावात्मक धरातलों का थोड़ा बहुत अध्ययन कर मनोविज्ञान ने अपने घेरे में लेने का प्रयत्न तो किया है किन्तु वह भी सतही रह गया है। साइको फार्मेसी भी इसे पकड़ने का प्रयास कर रहा है किन्तु उसे दिशा तथा छोर नहीं मिल रहे हैं। आत्मिक धरातल से फिलासफी भी बहुत दूर छूट जाती है। इसी प्रकार आधुनिक विज्ञान तथा अध्ययन अभी बेहद पीछे और अधूरे छूट गये हैं। जबकि तत्वार्थ सूत्र हमारे जीवन की ‘‘अनुभूतियों’’ के तीनों धरातलों (Three Dirmesions) को विश्लेषित करते हुए हमें सूत्रों के माध्यम से जगाता है।

 

स्नेह रानी जैन
रीडर—फॉर्मेसी विभाग, डॉ. हरिसिंह गौर वि. वि., सी—५८, गौर नगर, सागर
अर्हत् वचन अप्रैल ९६—पेज ६७

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