दूसरों को बुद्धिहीन मानना स्वयं के ज्ञान की कमी है: वैज्ञानिक धर्माचार्य कनकनंदीजी महाराज

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13094274_1082773115116747_6441632376662308749_nसागवाड़ा : पुनर्वासकॉलोनी के विमलनाथ दिगंबर जैन मंदिर में वैज्ञानिक धर्माचार्य कनकनंदी महाराज ने बुधवार को धर्मसभा में कहा कि प्राकृतिक रूप से किसी वस्तु की प्राप्ति दोहन या शोषण नहीं अपितु प्रकृति की भेंट है। उन्होंने भाषा के बारे में बताते हुए कहा कि अधिक भाषा का ज्ञान रखने वाला व्यक्ति प्रगतिशील, प्रज्ञा शील और ज्ञानवान होता है। नई भाषाओं के ज्ञान से बुद्धि का विकास होता है। संपूर्ण ब्रह्मांड का ज्ञान व्यवहार ज्ञान और स्वयं के बारे में ज्ञान निश्चय ज्ञान कहलाता है। व्यवहार ज्ञान के बिना निश्चय ज्ञान नहीं होता। पूर्व काल में अधिक पुण्यों के कारण मोक्ष मिलना सरल रहता था। लेकिन वर्तमान में पुण्यार्जन की कमी है। जिससे समाज में विषमताएं और बुराइयां बढ़ती जा रही हैं। दूसरों को बुद्धिहीन मानना स्वयं के ज्ञान की कमी को दर्शाता है।

वहीं सबको ज्ञानी मानना सम्यक दर्शन की पुष्टि करता है। आचार्य ने मौन व्रत की व्याख्या करते हुए कहा कि नीज आत्म भाव में लीन रहना ही मौन है। केवल चुप रहना मौन नहीं है। नीज आत्मा की भावना करते हुए बाहर से अशांत दिखने वाले भी शांत हो सकते हैं। अहिंसा धर्म की व्याख्या करते हुए बताया कि बॉर्डर पर देश की सुरक्षा के भाव से हिंसा करने वाले सैनिक भी उसी तरह अहिंसक है। जैसे गुरु अपने शिष्य को उसके भले के लिए डांटता हैं फिर भी वह हिंसक नहीं माना जाता है, क्यों कि उनके भाव शिष्य को तराशने के है इसलिए वो हिंसा नहीं है।

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