पूज्य प्रवर आचार्य श्री महाश्रमण जी ने महती कृपा कर साध्वी श्री सम्बुद्ध यशा जी “जसोल” को “साध्वीवर्या” का अलंकरण प्रदान किया,

0
204

पूज्य प्रवर आचार्य श्री महाश्रमण जी ने महती कृपा कर साध्वी श्री सम्बुद्ध यशा जी “जसोल” को “साध्वीवर्या” का अलंकरण प्रदान किया,
÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=
13138816_520605061456404_66976584587435833_nचूँकि साधू समुदाय जन-जन के आस्था के प्रतीक होते हैं, अतः उन चारित्र आत्माओं से जुड़ी हर गति-प्रगति तथा उपलब्धी आदि समाज से जुड़े लोगों के लिए गौरव का प्रतीक ही होती हैं, हम घर-गृहस्थी भरे संसार में लिप्त लोगों में हर तरह का राग-अनुराग समाया हुआ रहता हैं, अतः हम में से प्रत्येक व्यक्ति में प्राय हर्ष-शोक, ख़ुशी-गम हर तरह की अनुभूतियाँ अमूमन प्रकट होती ही हैं, आज 6 मई की भोर में जब शांतिदूत आचार्य प्रवर ने आसाम की पूण्य धरा पर अपने मुखारविन्द से जसोल मूल की साध्वी श्री सम्बुद्ध यशा जी (जसोल) को कार्यकारी अलंकरण के तहत “साध्वीवर्या” का सम्बोधन प्रदान किया तो यकायक मेरी आँखों के समक्ष उर्वरा भूमि जसोल का गौरवशाली इतिहास उभर आया, वो उर्वरा भूमि जहां त्यागी-वैरागियों का विपुल संसार समाया हुआ हैं, वहां संयम व समता रूपी फसल लहलहाती हैं, इस जसोल कस्बे में अगर जैनों की आबादी के अनुपात में सयंम एंव समता की साधना में लीन साधू-सन्तों, त्यागी, वैरागियों की संख्या का एक अनुपात अगर तय कर दिया जाए तो निश्चित रूप से प्रत्येक 10 घरों में से एक पूण्य आत्मा का जुड़ाव संयम व समता के इस अदभुत संसार से मिलेगा, धन्य हे जसवल धरा… एंव धन्य हे जसोल का गौरवशाली इतिहास..हम सभी जसोल वासी एंव मालाणी-सिवांची की धरा के वाशिंदे पूज्य प्रवर आचार्य श्री महाश्रमण जी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं कि आप श्री ने साध्वी श्री सम्बुद्ध यशाजी को महती कृपा कर “साध्वीवर्या” के अलंकरण से अलंकृत किया..
÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷=÷

गणपत भंसाली (जसोल-सूरत)

LEAVE A REPLY