प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज : जन्मदिन विशेष

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आज बालयति #भगवान_वासुपूज्य जी का गर्भ कल्याणक, भगवान विमलनाथ जी का मोक्ष कल्याणक व #चारित्र_चक्रवर्ती #आचार्य शांतिसागर जी महाराज का जन्म दिवस है

आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज का जन्म अपने मामा के घर येलगुल जिला-बेलगाँव में आषाढ़ कृष्णा ६ संवत् 1929,सन् 1872 में हुआ था,आपके पिता श्री भीमगोड़ा पाटिल व माता सत्यवती बाई थी।

*????????आचार्यश्री जन्मना क्षत्रिय जैन थे,आप चतुर्थ जाति से थे,महापुराणकार श्रीमद् जिनसेन आदि महामुनि इस कुल में उत्पन्न हुए थे।*

????????आचार्यश्री के बचपन का नाम सातगौंडा था,अल्पायु में आपका विवाह हुआ पर कुछ समय बाद ही बालिका का देहांत हो गया,अतएव आप बाल ब्रह्मचारी रहे।आपके गृहस्थ जीवन के ज्येष्ठ भ्राता आपसे ही दीक्षित मुनिश्री वर्धमानसागर जी(वर्धमान स्वामी) थे।

*????????आप श्रमण संस्कृति के प्रवर्तक थे,आपने विषमकाल में मुनि देवेन्द्रकीर्ति जी से मुनि दीक्षा लेकर आगमोक्त मुनि परम्परा की पुनर्स्थापना की।*

????????आचार्य श्री ने दक्षिण से लेकर उत्तर तक बिहार,उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश,राजस्थान,गुजरात आदि प्रदेशों की हजारों किमी की यात्रा बिना किसी यांत्रिक संसाधन के पदविहार करके पूर्ण की।

*????????आचार्य श्री 7 दिन उपवास करके 8वें दिन पड़गाहन व नवधा भक्ति होने पर आहार ग्रहण करते थे।*

????????योगीन्द्र चूड़ामणि आचार्य महाराज ने 18 वर्ष की आयु में जूतों का,32 वर्ष की आयु में घी व नमक का,एवं ऐलक दीक्षोपरांत आजीवन सवारी का त्याग कर दिया।एवं साथ ही आपने 84 वर्ष की कुल आयु में जीवन के 58 वर्ष तक उपवास किए।

*????????चलते-फिरते जीवंत जिनालय आचार्यश्री ने धवला जी,महाधवला जी आदि सिद्धांत ग्रन्थों को ताम्रपत्र पर अंकित करवाया था व धर्मरक्षा हेतु 3 वर्ष 12 दिन के बाद अन्न का आहार ग्रहण किया।*

???????? दिगंबरत्व भूषण आचार्यश्री ने सप्त ऋषिराज के साथ 1926 से 1936 तक उत्तर भारत में पदविहार कर दिगंबरत्व की धर्मध्वजा फहराई।

*????????1000 वर्ष के लम्बे अंतराल पर नेत्रज्योति क्षीण होने के कारण आपने स्वप्रेरणा से अपना आचार्य पद प्रथम शिष्य मुनि वीरसागर जी को सौंपकर सल्लेखना ग्रहण कर ली,व सिद्धक्षेत्र कुंथलगिरी में समाधिमरण किया।*

????????त्रिभुवन तिलक चूड़ामणि आचार्यश्री की आत्मा निश्चय ही उच्च गति को प्राप्त हुई होगी इसमें कोई संदेह नहीं है।

*????????आचार्य महाराज को समाधि से पूर्व स्वप्न आया था कि उनका जीव आगामी भव में पुष्करार्ध द्वीप के तीर्थंकर के रुप में अवतरित हुआ है,ऐसा ही स्वप्न भट्टारक जिनसेन महाराज को भी आया था,महान आत्माओं को आए स्वप्नों सदैव सत्य होते है,आचार्य श्री भी भरत क्षेत्र के जीवों का कल्याण कर पुष्करार्ध द्वीप में जन्म लेकर अनन्त जीवों का कल्याण करे ऐसी भावना।

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