प.पू. गणिनी पज्ञाश्रमणी आर्यिकारत्न 105 श्री शुभमती माताजी ससंघका मंगल विहार

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प.पू. जिनधर्म प्रभाविका गणिनी पज्ञाश्रमणी आर्यिकारत्न १०५ श्री शुभमती माताजी ससंघ का मंगल विहार

सिद्ध क्षेत्र मांगितुंगी के लिए शुरू हो गया है ।

मंगल विहार की रुपरेखा

११/१/२०१६ सोमवार ६:३० प्रातः विहार दूरी ६ कि़मी भीवंडी ,गोकुलनगर,शिवाजी चौक ।आहार-चर्या वहीं रात्रि मुकाम।

१२/१/२०१६ मंगलवार भीवंडी से शौर्यशांति विहारधाम ।आहार एवं रात्रि मुकाम। दूरी १० किमी ।

१३/१/२०१६ बुधवार शौर्यधाम से रवीरंजन( कान्दली) दूरी ११.५ किमी आहार होगा । शांम को ४:०० बजे कान्दली से वाशिंदे तक रात्रि मुकाम। दूरी ४.५ किमी ।

१४/१/२०१६ गुरुवार को वाशिंदे से शाहपुर दूरी ७ किमी ।आहार वहीं होगा। शाम को शाहपुर से आँठगाँव दूरी ६ किमी, रात्रि मुकाम।

१५/१/२०१६ शुक्रवार आँठगाँव से खर्डी। दूरी १० किमी।आहार एवं रात्रि मुकाम।

१६/१/२०१६ शनिवार खर्डी से विहारधाम साईविलेज होटल के बाजू मे) दूरी ११ किमी।आहार एवं रात्रि मुकाम।

१७/१/२०१६ रविवार को विहारधाम से लतीफा वाडी़। दूरी १० किमी।आहार चर्या वहीं ।
विहार में समय पर पधारकर पुण्यार्जन करें

3 COMMENTS

  1. [11:36AM, 11/04/2016] एक दुजा: आत्मार्थी मुनिराज सोचते हैं कि मैं किस से क्या बात करूँ; क्योंकि जो भी इन आँखों से दिखाई देता है, वे सब शरीरादि तो जड़ हैं, मूर्तिक हैं, अचेतन हैं, कुछ समझते नहीं हैं और चेतन तो स्वयं ज्ञानस्वरूप है । जो योगी व्यवहार में सोता है, वह अपने आत्मा के हित के कार्य में जागता है और जो व्यवहार में जागता है, वह अपने कार्य में सोता है । इसप्रकार जानकर योगीजन समस्त व्यवहार को त्यागकर आत्मा का ध्यान करते हैं ।
    सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र की परिभाषा बताते हुए आचार्यदेव कहते हैं कि जो जाने, सो ज्ञान; जो देखे, सो दर्शन और पुण्य और पाप का परिहार ही चारित्र है अथवा तत्त्वरुचि सम्यग्दर्शन, तत्त्व का ग्रहण सम्यग्ज्ञान एवं पुण्य-पाप का परिहार सम्यक्चारित्र है । तपरहित ज्ञान और ज्ञानरहित तप – दोनों ही अकार्य हैं, किसी काम के नहीं हैं, क्योंकि मुक्ति तो ज्ञानपूर्वक तप से होती है । ध्यान ही सर्वोत्कृष्ट तप है, पर ज्ञान-ध्यान से भ्रष्ट कुछ साधुजन कहते हैं कि इस काल में ध्यान नहीं होता, पर यह ठीक नहीं है; क्योंकि आज भी सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र के धनी साधुजन आत्मा का ध्यान कर लौकान्तिक देवपने को प्राप्त होते हैं और वहाँ से चयकर आगामी भव में निर्वाण की प्राप्ति करते हैं । पर जिनकी बुद्धि पापकर्म से मोहित है, वे जिनेन्द्रदेव तीर्थंकर का लिंग (वेष) धारण करके भी पाप करते हैं; वे पापी मोक्षमार्ग से च्युत ही हैं ।
    निश्चयतप का अभिप्राय यह है कि जो योगी अपने आत्मा में अच्छी तरह लीन हो जाता है, वह निर्मलचरित्र योगी अवश्य निर्वाण की प्राप्ति करता है । इसप्रकार मुनिधर्म का विस्तृत वर्णन कर श्रावकधर्म की चर्चा करते हुए सबसे पहले निर्मल सम्यग्दर्शन को धारण करने की प्रेरणा देते हैं । कहते हैं कि अधिक कहने से क्या लाभ है ? मात्र इतना जान लो कि आज तक भूतकाल में जितने सिद्ध हुए हैं और भव�
    [11:40AM, 11/04/2016] एक दुजा: भविष्यकाल में भी जितने सिद्ध होंगे, वह सर्व सम्यग्दर्शन का ही माहात्म्य है । आगे कहते हैं कि जिन्होंने सर्वसिद्धि करनेवाले सम्यक्त्व को स्वप्न में भी मलिन नहीं किया है, वे ही धन्य हैं, वे ही कृतार्थ हैं, वे ही शूरवीर हैं और वे ही पंडित हैं । अन्त में मोक्षपाहुड का उपसंहार करते हुए आचार्य कहते हैं कि सबसे उत्तम पदार्थ निज शुद्धात्मा ही है, जो इसी देह में रह रहा है । अरहंतादि पंचपरमेष्ठी भी निजात्मा में ही रत हैं और सम्यग्दर्शन, ज्ञान और चारित्र भी इसी आत्मा की अवस्थाएँ हैं; अत: मुझे तो एक आत्मा का ही शरण है । इसप्रकार इस अधिकार में मोक्ष और मोक्षमार्ग की चर्चा करते हुए स्वद्रव्य में रति करने का उपदेश दिया गया है तथा तत्त्वरुचि को सम्यग्दर्शन, तत्त्वग्रहण को सम्यग्ज्ञान एवं पुण्य-पाप के परिहार को सम्यक्चारित्र कहा गया है । अन्त में एकमात्र निज भगवान आत्मा की ही शरण में जाने की पावन प्रेरणा दी गई है ।
    इस अधिकार में समागत कुछ महत्त्वपूर्ण सूक्तियाँ इसप्रकार हैं –
    (१) आदसहावे सुरओ जोई सो लहइ णिव्वाणं – आत्मस्वभाव में सुरत योगी निर्वाण का लाभ प्राप्त करता है ।
    (२) परदव्वादो दुग्गइ सद्दव्वादो हु सुग्गई होइ – परद्रव्य के आश्रय से दुर्गति होती है और स्वद्रव्य के आश्रय से सुगति होती है ।
    (३) तम्हा आदा हु मे सरणं – इसलिए मुझे एक आत्मा की ही शरण है ।
    (४)

  2. द्रव्य दृष्टि से देखा जाए तो निजध्रुव अनादि अनंत है शाश्वत सत्य शुध्द ही है, ऐसा जाणे तो ही पर्याय में शुध्दता आती हैं, स्वरूप समझने से कर्म में भी अनुतानुबंधी की चौकडी से बचते हैं व्रती होता है, और आनंद की अनुभूति होती हैं. प्रथमाचार्य शांति सागरजी महाराज ने बताया ,आत्मचिंतन में ही एक दूसरे से अलग हो गए हैं और इस दौरान उन्होंने कहा कि यह एक ऐसा विषय है कि इस तरह से तैयार किए गए हैं, प्रथम कोई भी व्यक्ति को अपने द्रव्यदृष्टी में ही उपयोग में अपना निजध्रुवअनादि अनंत है यह प्रत्यक्ष रूप से वेदन अनुभव से ही सही समयसार की ओर से स्वसमय की ओर से निश्चिंत हो सकता है. यही कारण है पर्याय में भी शुध्दता होती हैं.
    एक समय में कोई भी जीव विज्ञान में स्नातक होने वाले यह समझते हैं कि एक समय में मैं एकही विचार कर रहे हैं,
    उस समय इतर कौनसी भी विचारधारा नहीं हो सकता है बस एक ही बात है कि अपने आप को जाणो मैं हूँ ।

  3. पुण्य यह व्यवहार से ही सही, लेकिन अब तक का सफर करने वाले लोगों की संख्या में द्रव्यदृष्टी के लिए भी तैयार कर लिया है, तो प्रथमाचार्य के शांति सागरजी के आदेशानुसार आत्मचिंतन में ही उपयोग कर सकते हैं, निर्जरा ही है. शुध्दोहम् के साथ मिलकर इस पर विचार विमर्श कर रहे तो आनंद है. ।

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