सुनील प्राकृत समग्र’ पर राष्ट्रीय प्राकृत संगोष्ठी सम्पन्न

0
232

मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय उदयपुर के प्राकृत एवं जैनागम विभाग के अन्तर्गत आचार्य श्री सुनीलसागर जी महाराज द्वारा कृत और प्रो.उदयचंद्र जैन, प्रो. दामोदर शास्त्री, डाॅ. महेन्द्रकुमार जैन मनुज द्वारा सम्पादित ‘सुनील प्राकृत समग्र’ का सांस्कृतिक वैशिष्ट्य’ पर दिनांक 17 एवं 18 नवम्बर 2017 को उदयपुर में आचार्यश्री सुनील सागरजी महाराज के ससंघ सान्निध्य में द्विदिवसीय राष्ट्रीय प्राकृत संगोष्ठी सम्पन्न हुई।

उद्घाटन सत्र 17 नवम्बर को प्रातः 8ः15 पर प्राकृताचार्य आचार्य श्री सुनीलसागरजी ससंघ के सान्निध्य में सम्पन्न हुआ। मंगलाचरण डाॅ. रेखा जैन एवं समाज की बहनों द्वारा किया गया, अध्यक्षता प्रो. प्रेमसुमन जैन अयक्ष- भरतीय प्राकृत स्कालर्स सोसायटी उदयपुर ने की, मुख्य आतिथि डाॅ. श्रेयांश कुमार जै, बड़ौत, सारस्वत अतिथि प्रो. उदयचन्द जैन उदयपुर थे जिन्होंने प्राकृत भाषा में वक्तव्य दिया। स्वागत भाषण एवं विषय प्रवेश विवेचन पऋो. जिनेन्द्र कुमार जैन अध्यक्ष- जैन विद्वा एवं प्राकृत विभाग, मो.सु.वि.वि. उदयपुर ने किया। आभार प्रदर्शन संगोष्ठी के संयोजक डाॅ. राजेश कुमार जैन-सदस्य आचार्य श्री सुनीलसागर जी म. चातुर्मास समिति, उदयपुर ने किया। इस सत्र के संयोजक डाॅ. ज्योति बाबू जैन ने किया। सत्र के अन्त में आचार्यश्री के प्रवचन हुए।
द्वितीय सत्र दोपहर 2 बजे प्रारंभ हुआ। इस सत्र में डाॅ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’-इन्दौर ने ‘‘आचार्य सुनीलसागरकृत भावालोयण की व्यावहारिक संदृष्टि’’ विषय पर आपना शोध आलेख प्रस्तुत किया, डाॅ. सरोज जैन-उदयपुर ने ‘‘आचार्य सुनीलसागरकृत सुनील प्राकृत समग्र में प्रयुक्त सूक्तियों का वैश्ष्ट्यि’’ विषय पर, श्री आशीष जैन वाराणसी ने इसी ग्रन्थ के  बारह भावना के चिन्तन में वैराग्यपरक संदृष्टि, प्रो. पारसमल अग्रवाल-उदयपुर ने ‘‘भावणासारो में दुःख-मुक्ति के सूत्र’’, डाॅ. मधु जैन -वाड़मेर ने ‘‘सुनील प्राकृत समग्र में अंकित वैचारिक समन्वय के सूत्र’’, डाॅ. सुमत कुमार जैन- जयपुर ने ‘‘आ. सुनीलसागरकृत वंदे जिणिंद-गोम्मटं (गोम्मटेश स्तुति) एवं मज्झ-भावण के प्राकृत पद्यानुवाद का वैशिष्ट्य’’ पर, और डाॅ. कल्पना जैन-दिल्ली ‘‘भावणासारो में वर्णित बारह भावनाओं का वैशिष्ट्य’’ विषय पर आपना शोध आलेख प्रस्तुत किया। इस सत्र की अध्यक्षता डाॅ. देव कोठारी-उदयपुर और संयोजन डाॅ. राजेश कुमार जैन दउयपुर ने किया। सत्रांत में आचार्यश्री के प्रवचन हुए। उन्होंने कहा कि अनायास ही प्राकृत की रचना प्रारम्भ हो गई, पहले ‘‘भारदी थुदी’’ रचित हुई तदोपरान्त अन्य रचनायें सहज ही होती गई, अलग से कोई  संयोजना नहीं की। उन्होंने कहा कहा कि प्राकृत की उनकी पहली रचना इसी उदयपुर की धरती पर ही लिखी गई थी।
तृतीय सत्र 17 नवम्बर को रात्रि 6ः45 से प्रारम्भ हुआ।  प्रथम डाॅ. सुभाष कोठारी-उदयपुर ने आ. सुनीलसागर कृत अज्झप्पसारो में आत्म-साधना का विकास’’ विषय पर आपना शोध आलेख प्रस्तुत किया, श्रीमती सुरेखा एस. नरदे-सांगली ने ‘‘सुनील प्राकृत समग्र में दार्शनिकता के सूत्र’’ विषय पर, डाॅ निर्मला जैन -उदयपुर ने भावणासारो में भावशुद्धि: एक चिन्तन’’ पर, डाॅ. आशीष जैन-शाहगढ़ ने ‘‘सम्मदि-सदी में गुरुभक्ति एवं संयम की साधना का वैशिष्टय’’ विषय पर प्रारम्भ में प्राकृत भाषा में बोलना प्रारम्भ किया फिर हिन्दी में पेपर पढ़ा। राजेश कुमार जैन-उदयपुर ने ‘‘आ. सुनीलसागरकृत प्राकृत कृतियों में धर्म की अवधारणा’’, प्रतिष्ठाचार्य पं. श्रवण कुमार जैन-सागर ने ‘‘सुनील प्राकृत समग्र में वर्णित भक्ति-वैशिष्ट्य’’ पर,  श्रीमती सीमा जैन उदयपुर ने ‘‘वयणसारो के संदर्भ में शान्ति की संस्कृति के सूत्र’’ विषय पर, श्री वीरचन्द्र जैन और पं. कोमल-लोहारिया ने भी अपने आपने विषय पर आपना शोध आलेख प्रस्तुत किया। – इस सत्र के अध्यक्ष डाॅ. एस. एल. गोधावत-उदयपुर थे व संयोजन डाॅ. योगेश कुमार जैन, लाडनूं ने किया।
दिनांक 18 नवम्बर को प्रातः 8 बजे से चतुर्थ सत्र प्रारम्भ हुआ। इस सत्र के अध्यक्ष डाॅ. उदयचन्द्र जैन उदयपुर थे व संयोजन डाॅ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’ इन्दौर ने किया। प्रारम्भ में  डाॅ. रेखा जैन के मंगलाचरण के उपरान्त  चार आलेख वाचकों ने आपने पत्रों का वाचन किया। वे इस प्रकार हैं- डाॅ. एस. एल. गोदावत- उदयपुर, प्रो. जिनेन्द्र जैन-उदयपुर, प्रो. जयकुमार जैन-नई दिल्ली और पत्रकार विष्णु कुमार-इटावा ने अपने शोध आलेख प्रस्तुत किये। प्रारंभ के तीन आलेख क्रमशः इस प्रकार हैं- 1. सुनील प्राकृत समग्र में अंकित कषाय मुक्ति के सूत्र, 2. आ. सुनीलसागर का प्राकृत साहित्य के विकास में योगदान और 3.वयणसारो में प्रतिपादित चारित्र-शुद्धि।
पंचम सत्र पुनः 11 बजे प्रारम्भ हुआ। इसकी अध्यक्षता डाॅ. श्रीयांस सिंघई-जयपुर ने व संचालन डाॅ. आशीष  आचार्य शाहगढ़ ने किया। इसमें डाॅ. सनत कुमार जैन-जयपुर, प्रो. कमलेश जैन -जयपुर, डाॅ. ज्योति बाबू जैन-उदयपुर, डाॅ. रेखा जैन-उदयपुर, एड. अनूपचन्द्र जैन -फिरोजाबाद इन पांच विद्वानों ने आलेख वाचन किया।
षष्ठ समापन सत्र रात्रि 6ः45 पर डाॅ. रेखा जैन के मंगलाचरण से प्रारंभ हुआ। इस सत्र की अध्यक्षता प्रो. पारसमल अग्रवाल ने की, मुख्यातिथ्य प्रो. जयकुमार जैन ने ग्रहण किया, सारस्वत अतिथि डाॅ. श्रेयांस जैन थे, प्रतिवेदन प्रो. जिनेन्द्र जैन ने पढ़ा आगत विद्वानों के सम्मान के उपरान्त संगोष्ठी संयोजक डाॅ. ज्योति बाबू जैन के आभार के साथ संगोष्ठी सम्पन्न की गई। इसमें विद्वानों ने सुनील प्राकृत समग्र को विभिन्न विश्व विद्यालयों के पाठ्यक्रमों में रखने की अनुशंसा की, प्रो. प्रेम सुमन जैन ने कहा कि वे मो.सु.वि.वि उदयपुर के जैन विद्या एवं प्राकृत विभाग में प्रतिवर्ष आ. सुनीलसागर प्राकृत व्याख्यानमाल प्रारम्भ करवाने का प्रयास करेंगे। सभी विद्वानों को आचार्यश्री सुनीलसागरजी महाराज ने आश्ीर्वाद दिया तथा प्राकृत विद्या के क्षेत्र में और अधिक कार्य करने के लिये प्रेरणा दी।
आपको अवगत कराते हुए है हर्ष है कि दिनांक 17-18 नवम्बर (शुक्रवार एवं शनिवार) 2017 को एम.एल. सुखाडिया विश्वविद्यालय, उदयपुर में प्रो प्र्रेमसुमन जैन, उदयपुर के निर्देशन में ‘‘आचार्य सुनीलसागर कृत ‘सुनील प्राकृत समग्र’ विषय पर राष्ट्रीय आयोजित की गई है। इसमें आप सादर आमंत्रित हैं। संलग्न पत्रक में विषय-विवरण दिया गया है, तदनुसार आपना आलेख तैयार कर समय पर पधारे का कष्ट करें।
 
-डाॅ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’, इन्दौर

LEAVE A REPLY